मन्त्र फूंककर अग्नि प्रज्वल्लित करना (पाखण्ड-खण्डन श्रृंखला-1)

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ओ३म् मारय-मारय, उच्चाटय- उच्चाटय, विद्वेषय- विद्वेषय, छिन्दी- छिन्दी, भिन्दी- भिन्दी, वशीकुरू- वशीकुरू, खादय- खादय, भक्षय- भक्षय, त्राटय- त्राटय, नाशय- नाशय, मम शत्रुन् वशीकुरू- वशीकुरू, हुं फट् स्वाहा….!!”

आदि मोहिनीमारण के तन्त्रमन्त्रोच्चार ने पूरे वातावरण को भयप्रेत कर दिया। विशाल जन समुदाय “हर हर महादेव” की ध्वनि से अपनी उपस्थिति भान करवा रहा था।
सभी “बाबा जोगेन्दर पण्डित” जी को तरह तरह प्रसन्न करने में प्रयत्नरत थे। चढ़ावे पर चढ़ावा और फिर चढ़ावे पर चढ़ावा…..!
बाबा जी अद्भुत शक्तियों के स्वामी जो थे। पूरे इलाके में उनकी तान्त्रिक शक्तियों की चर्चा जोरों पर थी।

प्रबुद्धों के अनुसार उन्होंने अपनी कुण्डलिनी जागृत कर ली थी। लोग खड़े खड़े परस्पर कानाफूसी कर रहे थे। समीप से सुना तो पता चला
*”बाबा मन्त्र से ही हवनकुण्ड की अग्नि प्रज्वलित करने वाले हैं।”*
सुना तो अन्तस में विनोदी पटाखे फूट पड़े।

घर से महोत्सव के लिए जब निकला था तभी पड़ोस के दादाजी ने मेरी चंचलता भाँप कर चेताया था कि *”मनु (भवितव्य)* आज कोई खुराफाती न करना।”
तब तो “हाँ” में सर हिला दिया था।
परन्तु तनिक सोचो, शक्कर भी अपना शक्करत्व छोड़ता है भला?
वो भी तब जबकि अवसर स्वयं चलकर सम्मुख उपस्थित हुआ हो?

मुखिया जी के लाडले होने के कारण “बाबा जोगेन्दर पण्डित” के पार्श्व में ही बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
धूप, दशांग, सिन्दूर, रोली अक्षत , घी, सरसों, तिल तथा साथ ही अन्नादि हव्य पदार्थों से सुसज्जित थालें रखी थीं। बाबा जी भड़काऊँ काले परिधान में थे।

हवनकर्म प्रारम्भ ही होने वाला था। बाबा जी ने अपना विभत्स, अति भयानक मन्त्रोच्चार प्रारम्भ किया।
विज्ञान वर्ग का विद्यार्थी होने के कारण मेरी दृष्टि में बाबाजी की हर क्रियाकलाप संदेहपूर्ण प्रतीत हो रही थी। मैं पूर्णरूप से “बकोध्यानं” के आसन में था।

तभी अकस्मात् मन में अतितीव्र खुराफाती लहर कौंधी। अवसर पाते ही दृष्टि बचाते मैंने बाबाजी के सम्मुख रखी थाली की “सरसों, तिल व घी” अन्य थाल से बदल दी।
अन्तस में उमड़ते ठहाकों के ज्वार को बलपूर्वक पचाकर चुपचाप देखता रहा।

कुछ कर्मकाण्डी क्रियाकलापों के पश्चात् बाबाजी ने सम्मुख रखी थाल से “घी” लेकर हवनकुण्ड में डालनी प्रारम्भ कर दी।

बाबा ज्यों ज्यों कुण्ड में “घी” डालते त्यों त्यों उनके मन्त्रों का कोलाहल उच्च होता जा रहा था। घी छोड़ने के पश्चात् बाबा जोर जोर से *”फू……फू……”*. की ध्वनि करते हुए “तिल और सरसों” हवनकुण्ड में डाले जा रहे थे।

उपस्थित जनसमूह चमत्कार की प्रतिक्षा में लालायित था। बाबा पहले से उग्र प्रतीत हो रहे थे। बारम्बार थाल से सरसों-तिल हवनकुण्ड में डालकर जोर जोर से उच्चारित करते – *”फू……..”।*

कोई प्रभाव न होता देख बाबा तिलमिला गये।
उनकी मुखभंगिमा बदल चुकी थी। एकदम लाल…!!

बात प्रतिष्ठा की थी, अपने उक्त चमत्कार की पुरजोर घोषणा जो कर दी थी।
क्षण प्रतिक्षण मुख पर रूआँसी छा रही थी। वे कभी हाँथ में लिए सरसों व तिल को देखते तो कभी समीप बैठे यजमानों को, पूरी सन्देहभरी दृष्टि से।

उनका ये अभिनय-मंचन मुझसे सहन न हुआ, एक बलिष्ठ हँसी फूट पड़ी। वे मेरी समस्त खुराफातियों को भाँप गये।
*बोले- “दे, दो…!”*
मैंने हँसकर कहा – *”क्या..?”*
बोले- *”चलो एक तिहाई तुम्हारा हुआ”*
– क्या?
बोले- *चढ़ावा।*

तब तक मैं लोटपोट हो चुका था। चढ़ावे का नाम सुनकर अन्तस मेँ आग लग गयी। आचार्य को दी प्रतिज्ञा व “महर्षि दयानन्द” की वो पाखण्ड-खण्डनी छवि मानसचक्षुओं में नाच गयी।
अब वहाँ रूकना मेरी सामर्थ्य से बाहर था। बाबा मुझे लालायित दृष्टि से देख रहे थे।
बाबा के पाखण्ड का भाण्डा फूट चुका था।

शीघ्र ही पितामह तथा पंचो तक बात पहुँच गयी। उन्होंने पूरा विवरण गाँव के सम्मुख परोस दिया।
बाबा पकड़े गये।

मन्दिर के पुजारी जी ने बड़े चाव से बाबा जी को हनुमान जी का प्रसाद चखाया।
न जाने कहाँ-कहाँ से उनपर कृपा बरसी।

अन्ततः बाबा को ससम्मान पुलिस के तिहाड़ीधाम पहुँचाया गया। बाबा आज भी वहीं विराजमान हैं।

हा हा हा

घटना का वैज्ञानिक विश्लेषण:-
वे विद्यार्थी जो विज्ञान वर्ग से 9वीं से12 वीं कक्षा में अध्ययनरत हैं उन्हें इस अभिक्रिया (कथित चमत्कार ) को सिध्द करने के लिए कोई विशेष कठिनाईं नहीं होनी चाहिए।
मित्रों आपने “पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4)” का नाम तो सुना ही होगा, जो गाँवों में “लाल दवा” के नाम से सुलभ है। तथा दूसरा पदार्थ है “ग्लिसरिन”। जब इन दोनों पदार्थों की परस्पर अभिक्रिया करायी जाती है तो रासायनिक अभिक्रिया के फलस्वरूप इनका तीव्र “दहन” होने लगता है।
ऐसे में ढोंगी बाबा-गण पोटैशियम परमैंगनेट को “सरसों या तिल” की भाँति तथा श्वेत ग्लिसरिन को “घी” की भाँति प्रयुक्त कर अपने कथित चमत्कार का प्रदर्शन कर यज्ञ इत्यादि की अग्नि प्रज्वलित करते हैं।

*दार्शनिक व्याख्या:-* परमेश्वर शाश्वत तथा सनातन है। उसके अनुरूप ही उसके गुण-कर्म-स्वभाव भी शाश्वत, सनातन तथा अपरिवर्तनीय है। उसके बनाए सृष्टि नियमों को कोई भंग या दूषित नहीं कर सकता। यदि कोई ऐसा करता है तो ईश्वर “ईश्वर” नहीं कहला सकता। उसके कार्यों को भंग करने का सामर्थ्य किसी में भी नहीं।
यदि कोई बाबा चमत्कार प्रदर्शन कर स्वयं को ईश्वर से जुड़े होने की बात कहे तो निश्चित ही वह ढोंगी अथवा पाखंण्डी है क्योंकि चमत्कार (नियमभंग) ईश्वर के सत्ता की स्वीकृति नहीं बल्कि तामसी सत्ता के उपस्थिति की पुष्टि है। जो कि असम्भव है।

तमसो मा ज्योतिर्गमयः!
हे प्रभु, हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो!
ओ३म्!

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One response to “मन्त्र फूंककर अग्नि प्रज्वल्लित करना (पाखण्ड-खण्डन श्रृंखला-1)

  1. जहाँ तक तन्त्र-मन्त्र की बात है, उसे कुछ ज्ञान और कुछ कला का मिश्रण मानता हूँ। उसका उपयोग जग कल्याण के लिए किया जाय तो अच्छा है वरना बुरा। विज्ञान के भ्रम ने जितना हमारा कल्याण किया है उससे अधिक नुक्सान ही किया है। शायद इसलिए प्राचीन समय से गुरू अपने ज्ञान को देने में बड़ी सावधानी रखते थे। विज्ञान की ही बुरे लोगों की संगत से विनाशकारी हो जाता है। इसलिए मेरा मानना है तन्त्र-मन्त्र को एक विज्ञान मानकर कल्याण के रूप में उपयोग करना चाहिए। जिसने गलत उपयोग किया उसे कठोर दण्ड मिलना ही चाहिए। अतः जो विधि कल्याण के लिए किया जाए उसे पाखण्ड न कहा जाए।