भारतीय महापुरुषों की दृष्टि में इस्लाम

r1स्वामी विवेकानन्द

ऎसा कोई अन्य मजहब नहीं जिसने इतना अधिक रक्तपात किया हो और अन्य के लिए इतना क्रूर हो । इनके अनुसार जो कुरान को नहीं मानता कत्ल कर दिया जाना चाहिए । उसको मारना उस पर दया करना है । जन्नत ( जहां हूरे और अन्य सभी प्रकार की विलासिता सामग्री है ) पाने का निश्चित तरीका गैर ईमान वालों को मारना है । इस्लाम द्वारा किया गया रक्तपात इसी विश्वास के कारण हुआ है ।

कम्प्लीट वर्क आफ विवेकानन्द वॉल्यूम २ पृष्ठ २५२-२५३

r2गुरु नानक देव जी

मुसलमान सैय्यद , शेख , मुगल, पठान आदि सभी बहुत बर्बर व् निर्दयी हो गए हैं ।

जो लोग मुसलमान नहीं बनते थें उनके शरीर में कीलें ठोककर एवं कुत्तों से नुचवाकर और तरह तरह के अत्याचार दे कर मरवा दिया जाता था ।

नानक प्रकाश तथा प्रेमनाथ जोशी की पुस्तक पैन इस्लाममिज्म रोलिंग बैंक पृष्ठ ८०

r3महर्षि दयानन्द सरस्वती

इस मजहब में अल्लाह और रसूल के वास्ते संसार को लुटवाना और लूट के माल में खुदा को हिस्सेदार बनाना शबाब का काम हैं । जो मुसलमान नहीं बनते उन लोगों को मारना और बदले में बहिश्त को पाना आदि पक्षपात की बातें ईश्वर की नहीं हो सकती । श्रेष्ठ गैर मुसलमानों से शत्रुता और दुष्ट मुसलमानों से मित्रता , जन्नत में अनेक औरतों और लौंडे होना आदि निन्दित उपदेश कुएं में डालने योग्य हैं । अनेक स्त्रियों को रखने वाले मुहम्मद साहब निर्दयी , राक्षस व विषयासक्त मनुष्य थें , एवं इस्लाम से अधिक अशांति फैलाने वाला दुष्ट मत दसरा और कोई नहीं । इस्लाम मत की मुख्य पुस्तक कुरान पर हमारा यह लेख हठ , दुराग्रह , ईर्ष्या विवाद और विरोध घटाने के लिए लिखा गया , न कि इसको बढ़ाने के लिए । सब सज्जनों के सामन रखने का उद्देश्य अच्छाई को ग्रहण करना और बुराई को त्यागना है ।।

सत्यार्थ प्रकाश १४ वां समुल्लास विक्रमी २०६१

r4महर्षि अरविन्द

हिन्दू मुस्लिम एकता असम्भव है क्योंकि मुस्लिम कुरान मत हिन्दू को मित्र रूप में सहन नहीं करता । हिन्दू मुस्लिम एकता का अर्थ हिन्दुओं की गुलामी नहीं होना चाहिए । इस सच्चाई की उपेक्षा करने से लाभ नहीं ।किसी दिन हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़ने हेतु तैयार होना चाहिए । हम भ्रमित न हों और समस्या के हल से पलायन न करें । हिन्दू मुस्लिम समस्या का हल अंग्रेजों के जाने से पहले सोच लेना चाहिए अन्यथा गृहयुद्ध के खतरे की सम्भावना है । ।

ए बी पुरानी इवनिंग टाक्स विद अरविन्द पृष्ठ २९१-२८९-६६६

r5सरदार वल्लभ भाई पटेल

मैं अब देखता हूं कि उन्हीं युक्तियों को यहां फिर अपनाया जा रहा है जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था । मुसलमानों की पृथक बस्तियां बसाई जा रहीं हैं । मुस्लिम लीग के प्रवक्ताओं की वाणी में भरपूर विष है । मुसलमानों को अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन करना चाहिए । मुसलमानों को अपनी मनचाही वस्तु पाकिस्तान मिल गया हैं वे ही पाकिस्तान के लिए उत्तरदायी हैं , क्योंकि मुसलमान देश के विभाजन के अगुआ थे न कि पाकिस्तान के वासी । जिन लोगों ने मजहब के नाम पर विशेष सुविधांए चाहिंए वे पाकिस्तान चले जाएं इसीलिए उसका निर्माण हुआ है । वे मुसलमान लोग पुनः फूट के बीज बोना चाहते हैं । हम नहीं चाहते कि देश का पुनः विभाजन हो ।

संविधान सभा में दिए गए भाषण का सार ।

r6बाबा साहब भीम राव अंबेडकर

हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही एक हल है । यदि यूनान तुर्की और बुल्गारिया जैसे कम साधनों वाले छोटे छोटे देश यह कर सकते हैं तो हमारे लिए कोई कठिनाई नहीं । साम्प्रदायिक शांति हेतु अदला बदली के इस महत्वपूर्ण कार्य को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा । विभाजन के बाद भी भारत में साम्प्रदायिक समस्या बनी रहेगी । पाकिस्तान में रुके हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं की सुरक्षा कैसे होगी ? मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर सम्मान के योग्य नहीं है । मुसलमान की भातृ भावना केवल मुसमलमानों के लिए है । कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का विरोधी है , इसीलिए हिन्दू सिर्फ घृणा और शत्रुता के योग्य है । मुसलामनों के निष्ठा भी केवल मुस्लिम देश के प्रति होती है । इस्लाम सच्चे मुसलमानो हेतु भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट संबधी मानने की आज्ञा नहीं देता । संभवतः यही कारण था कि मौलाना मौहम्मद अली जैसे भारतीय मुसलमान भी अपेन शरीर को भारत की अपेक्षा येरूसलम में दफनाना अधिक पसन्द किया । कांग्रेस में मुसलमानों की स्थिति एक साम्प्रदायिक चौकी जैसी है । गुण्डागर्दी मुस्लिम राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है । इस्लामी कानून समान सुधार के विरोधी हैं । धर्म निरपेक्षता को नहीं मानते । मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती । वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद का संकोच नहीं करते ।

प्रमाण सार डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय , खण्ड १५१

r7माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर श्री गुरू जी

पाकिस्तान बनने के पश्चात जो मुसलमान भारत में रह गए हैं क्या उनकी हिन्दुओं के प्रति शत्रुता , उनकी हत्या , लूट दंगे, आगजनी , बलात्कार , आदि पुरानी मानसिकता बदल गयी है , ऐसा विश्वास करना आत्मघाती होगा । पाकिस्तान बनने के पश्चात हिन्दुओं के प्रति मुस्लिम खतरा सैकड़ों गुणा बढ़ गया है । पाकिस्तान और बांग्लादेश से घुसपैठ बढ़ रही है । दिल्ली से लेकर रामपुर और लखनउ तक मुसलमान खतरनाक हथियारों की जमाखोरी कर रहे हैं । ताकि पाकिस्तान द्वारा भारत पर आक्रमण करने पर वे अपने भाइयों की सहायता कर सके । अनेक भारतीय मुसलमान ट्रांसमीटर के द्वारा पाकिस्तान के साथ लगातार सम्पर्क में हैं । सरकारी पदों पर आसीन मुसलमान भी राष्ट्र विरोधी गोष्ठियों में भाषण देते हें । यदि यहां उनके हितों को सुरक्षित नहीं रखा गया तो वे सशस्त्र क्रांति के खड़े होंगें ।

बंच आफ थाट्स पहला आंतरिक खतरा मुसलमान पृष्ठ १७७-१८७

r8गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर

ईसाई व मुसलमान मत अन्य सभी को समाप्त करने हेतु कटिबद्ध हैं । उनका उद्देश्य केवल अपने मत पर चलना नहीं है अपितु मानव धर्म को नष्ट करना है । वे अपनी राष्ट्र भक्ति गैर मुस्लिम देश के प्रति नहीं रख सकते । वे संसार के किसी भी मुस्लिम एवं मुस्लिम देश के प्रति तो वफादार हो सकते हैं परन्तु किसी अन्य हिन्दू या हिन्दू देश के प्रति नहीं । सम्भवतः मुसलमान और हिन्दू कुछ समय के लिए एक दूसरे के प्रति बनवटी मित्रता तो स्थापित कर सकते हैं परन्तु स्थायी मित्रता नहीं । ;

– रवीन्द्र नाथ वाडमय २४ वां खण्ड पृच्च्ठ २७५ , टाइम्स आफ इंडिया १७-०४-१९२७ , कालान्तर

r9मोहनदास करम चन्द्र गांधी

मेरा अपना अनुभव है कि मुसलमान कूर और हिन्दू कायर होते हैं मोपला और नोआखली के दंगों में मुसलमानों द्वारा की गयी असंख्य हिन्दुओं की हत्या, लूटपाट व् बलात्कार को देखकर अहिंसा नीति से मेरा विचार बदल रहा है ।

गांधी जी की जीवनी, धनंजय कौर पृष्ठ ४०२ व मुस्लिम राजनीति श्री पुरूषोत्तम योग

r10लाला लाजपत राय

मुस्लिम कानून और मुस्लिम इतिहास को पढ़ने के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि उनका मजहब उनके अच्छे मार्ग में एक रुकावट है । मुसलमान जनतांत्रिक आधार पर हिन्दुस्तान पर शासन चलाने हेतु हिन्दुओं के साथ एक नहीं हो सकते । क्या कोई मुसलमान कुरान के विपरीत जा सकता है ? हिन्दुओं के विरूद्ध कुरान और हदीस की निषेधाज्ञा की क्या हमें एक होने देगी ? मुझे डर है कि हिन्दुस्तान के ७ करोड़ मुसलमान अफगानिस्तान , मध्य एशिया अरब , मैसोपोटामिया और तुर्की के हथियारबंद गिरोह मिलकर अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देंगें ।
पत्र सी आर दास बी एस ए वाडमय खण्ड १५ पृष्ठ २७५

r11समर्थ गुरू राम दास जी

छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरू अपने ग्रंथ दास बोध में लिखते हैं कि मुसलमान शासकों द्वारा कुरान के अनुसार काफिर हिन्दू नारियों से बलात्कार किए गए जिससे दुःखी होकर अनेकों ने आत्महत्या कर ली । मुसलमान न बनने पर अनेक कत्ल किए एवं अगणित बच्चे अपने मां बाप को देखकर रोते रहे । मुसलमान आक्रमणकारी पशुओं के समान निर्दयी थे , उन्होंने धर्म परिवर्तन न करने वालों को जिन्दा ही धरती में दबा दिया ।

– डा एस डी कुलकर्णी कृत एन्कांउटर विद इस्लाम पृष्ठ २६७-२६८

r12राजा राममोहन राय

मुसलमानों ने यह मान रखा है कि कुरान की आयतें अल्लाह का हुक्म हैं । और कुरान पर विश्वास न करने वालों का कत्ल करना उचित है ।

इसी कारण मुसलमानों ने हिन्दुओं पर अत्यधिक अत्याचार किए , उनका वध किया , लूटा व उन्हें गुलाम बनाया ।

वाङ्मय-राजा राममोहन राय पृष्ट ७२६-७२७

r13श्रीमति ऐनी बेसेन्ट

मुसलमानों के दिल में गैर मुसलमानों के विरूद्ध नंगी और बेशर्मी की हद तक तक नफरत हैं । हमने मुसलमान नेताओं को यह कहते हुए सुना है कि यदि अफगान भारत पर हमला करें तो वे मसलमानों की रक्षा और हिन्दुओं की हत्या करेंगे । मुसलमानों की पहली वफादार मुस्लिम देशों के प्रति हैं , हमारी मातृभूमि के लिए नहीं । यह भी ज्ञात हुआ है कि उनकी इच्छा अंग्रेजों के पश्चात यहां अल्लाह का साम्राज्य स्थापित करने की है न कि सारे संसार के स्वामी व प्रेमी परमात्मा का का । स्वाधीन भारत के बारे में सोचते समय हमें मुस्लिम शासन के अंत के बारे में विचार करना होगा ।

– कलकत्ता सेशन १९१७ डा बी एस ए सम्पूर्ण वाङ्मय खण्ड, पृष्ठ २७२-२७५

r14स्वामी रामतीर्थ

अज्ञानी मुसलमानों का दिल ईश्वरीय प्रेम और मानवीय भाईचारे की शिक्षा के स्थान पर नफरत , अलगाववाद , पक्षपात और हिंसा से कूट कूट कर भरा है । मुसलमानों द्वारा लिखे गए इतिहास से इन तथ्यों की पुष्टि होती है । गैर मुसलमानों आर्य खालसा हिन्दुओं की बढ़ी संख्या में काफिर कहकर संहार किया गया । लाखों असहाय स्त्रियों को बिछौना बनाया गया । उनसे इस्लाम के रक्षकों ने अपनी काम पिपासा को शान्त किया । उनके घरों को छीना गया और हजारों हिन्दुओं को गुलाम बनाया गया । क्या यही है शांति का मजहब इस्लाम ? कुछ एक उदाहरणों को छोड़कर अधिकांश मुसलमानों ने गैरों को काफिर माना है ।

– भारतीय महापुरूषों की दृष्टि में इस्लाम पृष्ठ ३५-३६

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3 responses to “भारतीय महापुरुषों की दृष्टि में इस्लाम

  1. स्वामी विवेकानंद के विचार इस्लाम पर प्रकट कर के आपने अच्छा नहीं किया क्यों कि विवेकानंद स्वयं भ्रांत व्यक्ति थे | कहीं कुछ और कहीं कुछ लिखते कहते थे, वे स्वयं में स्पष्ट नहीं थे | देखिये निम्न वचन विवेकनादं के इस्लाम के बारे में |

    प्रमाण (१)
    विवेकानंद साहित्य, जन्मशती संस्करण, तृतीय खंड, अद्वैतआश्रम, ५ डिही एंटाली रोड, कलकत्ता १४, प्रकाशक स्वामी गंभीरानन्द, अध्यक्ष, अद्वैत आश्रम, मायावती, अल्मोड़ा, हिमालय है | व्याख्यान, प्रवचन एवं कक्षालाप – ३ में ईश्वर-प्रेम -१ (सितम्बर २५,१८९३ ई.को दिए गये एक भाषण की शिकागो हेरल्ड में रिपोर्ट, पृष्ठ २७२ में स्वामी विवेकानंद का विचार है “यदि ईश्वर ने ईसा, मुहम्मद और वेद के ऋषियों को सन्देश दिया है, तो वह उससे, अपने बच्चों में से एक से, क्यों नहीं बोलता ?”
    परिणाम बिंदु :-
    १) स्वामीजी के नाम से छापी अखबारी रिपोर्ट यदि सच है तो इस वाक्य में स्वामीजी क्या कहना चाह रहे हैं स्पष्ट नहीं है |
    २) क्या ईसा, मुहम्मद और वेद के ऋषि तीनों सामान स्तर के थे, सब का ज्ञान स्तर, सिद्धियाँ, शक्तियाँ, सामर्थ्य, शुद्धता समान थे ? ईसा के बारे में प्रचलित है कि वे भारत में अध्ययन करने आये थे, मुहम्मद स्वयं लम्पट थे और विद्यासंपन्न नहीं थे तो फिर ऋषियों से तुलना करना कितना युक्ति संगत है ?
    ३) ईश्वर क्यों नहीं बोलता ? ये प्रश्न निरर्थक नहीं है ? सगुण-निराकार ईश्वर जिसके मुख-नस-नाडी नहीं वह बोलेगा कैसे ? और अन्य प्रकार से इस बात को लें तो ईश्वर हमसे-आपसे कब बात नहीं करता, सदा-सर्वदा सद् कार्य के लिए प्रेरणा दे देकर वह बात ही तो करता है |

    प्रमाण (२)
    विवेकानंद साहित्य, जन्मशती संस्करण, तृतीय खंड, अद्वैतआश्रम, ५ डिही एंटाली रोड, कलकत्ता १४, प्रकाशक स्वामी गंभीरानन्द, अध्यक्ष, अद्वैत आश्रम, मायावती, अल्मोड़ा, हिमालय है | व्याख्यान, प्रवचन एवं कक्षालाप – ३ में ईश्वर-प्रेम -२ (फ़रवरी २०, १८९४ ई.को डिट्रॅाएट के यूनीटेरियन चर्च में दिए गये भाषण की डिट्रॅाएट फ्री प्रेस में रिपोर्ट, पृष्ठ २७४ में स्वामी विवेकानंद का विचार है “कुछ लोग उस धार्मिक उत्साह की उत्तेजना को समझना कठिन पाते हैं, जिसने मुहम्मद के हृदय को हिलाया था | वह मिट्टी में लोट जाते थे और कष्ट से ऐंठ उठते थे | उन पुनीत पुरुषों को, जिन्हें इन अत्यंत तीव्र भावों के अनुभूति हुई है, लोगों में मृगी का रोगी कहा है |”
    परिणाम बिंदु :-
    क्या कहना चाह रहे हैं कुछ स्पष्ट नहीं है | मुहम्मद को पुनीत पुरुष बतलाया है यहाँ |

    प्रमाण (३)
    विवेकानंद साहित्य, जन्मशती संस्करण, षष्ठ खंड, अद्वैतआश्रम, ५ डिही एंटाली रोड, कलकत्ता १४, प्रकाशक स्वामी गंभीरानन्द, अध्यक्ष, अद्वैत आश्रम, मायावती, अल्मोड़ा, हिमालय है | पृष्ठ है ४०५, स्वामीजी अपने एक मुस्लिम मित्र मुहम्मद सरफराज हुसैन को पत्र लिखते है की :- “इसके विपरीत हमारा अनुभव यह है की यदि किसी धर्म के अनुयायी व्यावहारिक जगत के दैनिक कार्यों के क्षेत्र में, इस समानता को योग्य अंश में ला सके हैं तो वे इस्लाम और केवल इस्लाम के अनुयायी हैं – यद्यपि सामान्यतः जिस सिद्धांत के अनुसार ऐसे आचरण का अवलंबन है, उसके गंभीर अर्थ से वे अनभिज्ञ हैं, जिसे की हिंदू साधारणतः स्पष्ट रूप से समझते हैं |” समीक्षा :- क्या विवेकानंद का यह कथन अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं है ? तथ्य तो यह है की यद्यपि मुस्लिम धर्मानुयायी अपने सहधर्मी के प्रति अवश्य ही भ्रातृत्व का व्यव्हार करते हैं, परन्तु इतिहास बतलाता है की अन्य धर्मावलंबियों के प्रति उनका व्यव्हार नितांत असहिष्णु रहा है | ગુજરાતી અનુવાદ પુસ્તક ૧૦, પૃષ્ઠ ૧૭૪
    पृष्ठ है ४०५ आगे स्वामीजी लिखते है की “इसलिए हमें दृढ विश्वास है की वेदांत के सिद्धांत कितने ही उदार और विलक्षण क्यों ना हों, परन्तु व्यावहारिक इस्लाम की सहायता के बिना, मनुष्य जाति के महान जनसमूह के लिए वे मूल्यहीन हैं|” समीक्षा :- कृपा कर इसका अर्थ हिंदी में क्या होता है बतलाने की कृपा करें | वेदांत मूल्यहीन है?-इस्लाम की सहायता के बिना???? वाह विवेकानंद जी, धन्य है आप | बेचारे आदि-शंकराचार्य तो इस्लाम को जाने बिना ही मृत्यु को प्राप्त हो गए और सारा जीवन वेदांत को समझने–समझाने में लगा दिया |
    पृष्ठ है ४०५ आगे इसी पत्र में स्वामीजी ने एक और कामना की है “हमारी मातृभूमि के लिए इन दोनों विशाल मतों का सामंजस्य – हिंदुत्व और इस्लाम – वेदान्ती बुद्धि और इस्लामी शरीर – यही एक आशा है |” पृष्ठ है ४०६ में लिखते कि मैं अपने मानस-चक्षु से भावी भारत की उस पूर्णावस्था को देखता हूँ, जिसका इस विप्लव और संघर्ष से तेजस्वी और अजेय रूप में वेदान्ती बुद्धि और इस्लामी शरीर के साथ उत्थान होगा |” समीक्षा :- क्या कहना चाह रहे है यहाँ विवेकानंद जी !!! आप कहेंगे शिष्टाचार यही कहता है की जिस व्यक्ति के बारे में या जिस व्यक्ति के धर्म/मत के बारे में आप लिख रहे है उसकी निंदा ना करें, पर स्वामीजी तो निंदा नहीं, प्रशंसा कर रहें हैं और प्रशंसा भी अतिरंजित करते हुवे | स्वामी दयानंद जी भी मुस्लिम मतानुयायी के घर जाते थे और निवास करते थे, खाना खाते थे पर अपने विचारों की दृढ़ता में कोई कमी नहीं आने देते थे | जो कहना है स्पष्ट और सबके सामने | मस्जिद में भी रुके तो कुरान की चर्चा और समीक्षा की | मंदिर में रुके तो हिंदू धर्म की चर्चा और समीक्षा | जिस जिस मत के स्थान पर रुके वहाँ उसी मत की गलत मान्यताओं का खंडन किया | स्वामी श्रद्धानन्द जी को भी दिल्ही की जामा मस्जिद में भाषण देने का सौभाग्य मिला था पर आपने वेद मन्त्र पढ़ा और आधा कलमा पढ़ा | आधा कलमा भी उतना ही पढ़ा जो की वैदिक मान्यताओं के अनुरूप और अनुकूल था | कितना अच्छा होता यदि विवेकानंद जी गोल मोल बातों को लिखने की जगह उपदेश देते | हमारे शास्त्रों में कही बातों में क्या कमी है ??

    प्रमाण (४)
    विवेकानंद साहित्य, जन्मशती संस्करण, षष्ठ खंड, अद्वैतआश्रम, ५ डिही एंटाली रोड, कलकत्ता १४, प्रकाशक स्वामी गंभीरानन्द, अध्यक्ष, अद्वैत आश्रम, मायावती, अल्मोड़ा, हिमालय है | पृष्ठ है ३७८, स्वामी विवेकानंद जी, स्वामी अखंडानन्द को मूलतः बंगाली में लिखा पत्र, १० अक्टूबर १८९७ मरी से पत्र लिखते हैं कि “पुनश्च – तुम्हें मुसलमान लड़कों को भी ले लेना चाहिए, परन्तु उनके धर्म को कभी दूषित न करना | तुम्हें केवल यही करना होगा कि उनके भोजन आदि का प्रबंध अलग कर दो और उन्हें शुद्धाचरण, पुरुषार्थ और परहित में श्रद्धापूर्वक तत्परता की शिक्षा दो | यह निश्चय ही धर्म है |” अंग्रेजी अनुवाद इस प्रकार है P.S: You must admit Mohammedan boys, too, but never tamper with their religion. The only thing you will have to do is to make
    separate arrangements for their food etc., and teach them so that they may be moral, manly, and devoted to doing good to others. This indeed is religion.
    समीक्षा :- हिंदू धर्म के प्रचारक के रूप में प्रचारित स्वामी विवेकानंद जी क्या कह रहें हैं ? निडरता की मूर्ति के रूप में ख्यात विवेकानंद जी मुस्लिम के बच्चों को लेकर हिंदू (वैदिक) धर्म कि शिक्षा देने में इतने सहमे / डरे क्यों हैं ? क्या वे हिंदू धर्म का प्रचार नहीं करना चाहते ? आज भारत सरकार भी तो यही कर रही है कि मुस्लिमों का सब प्रकार से ध्यान रखो और धर्म मत बदलो और ऐसे में हिंदू वादी संस्थाएं सरकार का विरोध करती हैं पर विवेकानंद भी तो वही करने का आदेश कर रहे हैं और हमारी वर्तमान सरकार भी वही कर रही है |
    आगे इसी पत्र में मन नहीं भरा तो फिर से वही उपदेश किया विवेकानंद ने पृष्ठ ३७९ “सब धर्मों के लड़कों को लेना – हिंदू, मुसलमान, ईसाई या कुछ भी हों, परन्तु धीरे धीरे आरम्भ करना – अर्थात् यह ध्यान रखना कि उनका खान-पान अलग हो, तथा धर्म की सार्वभौमिकता का ही केवल उन्हें उपदेश देना |” यहाँ स्वामी विवेकानंद जी ने फिर से एक बात दोहराई कि “उनका खान-पान अलग हो”, “उनके भोजन आदि का प्रबंध अलग कर दो” यहाँ स्वामी जी क्या कहना चाह रहे हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि मुस्लिम विद्यार्थी है तो उनको मांसाहार कि अनुमति हो और वे जो चाहे खा सकते हैं ??? क्यों कि स्वामी विवेकानंद भी तो मांसाहारी थे तो क्यों ना अपने व्यवहार में समझौतावादी, ढीले बनते |

    कृपा कर अपने इस पेज को सुधार कर लें | धन्यवाद |
    विश्वप्रिय

  2. यही सच है।मुसलमान हमेशा-हमेशा से गदृार है ओर रहेंगे

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